Thursday, 8 April 2010

Jai Guru Dev - Amar Sandesh (Mathura) - 3

Jai gurudev News: 05 Apr 2010Posted by Jai gurudev, Mathura on April 6, 2010 at 9:54am


आज प्रातः बाबा जयगुरूेदव जी महाराज ने अलागंज (शाहजहांपुर) मंे नामदान दिया। लाखों की संख्या में उपस्थित प्रेमियों, दर्शनार्थीयों को सम्बोधित करते हुए बाबा जी ने कहा कि यह मनुष्य शरीर उस मालिक ने दया करके आपको इस जन्म-मरण के फेर और चौरासी से छूटने के लिए दिया है। आपको जो अमोलक मनुष्य शरीर दिया वह बार-बार नहीं मिलता। इस बार मिल गया है तो भजन करके इसे सफल बना लो और इसमें, दोनों आंखों के पीछे जो जीवात्मा बैठी है उसे इस बार अपने घर पहुंचा दो। नामदान के बाद बाबा जी अपने काफिले के साथ रजाओ (बरेली) की ओर निकल गए। आज का रात्रि विश्राम वहीं होने की सूचना है। इसके पूर्व हरदोई में जब बाबा जी पहुंचे थे तो इतनी लम्बी लाईन दर्शन के लिए लगी थी कि बाबा जी को अपनी कुटी में पहंुचने में लगभग डेढ़- दो घण्टे लगे। बाबा जी ने वहां सत्संग किया व नामदान भी दिया। अपने संदेश में बाबा जी ने कहा कि तुम लोग अपनी परेशानियों, समस्याओं को लेकर आते हो तो मैं तुमसे यही कहता हूं कि भजन करो। भजन में सभी बातों का लाभ है। तुम जंगल में भी यदि चले जाओ तो तुम्हें इतना आनन्द मिलेगा कि तुम्हें अकेलापन नहीं खलेगा। भजन में सब कुछ है, दया का परिचय तुमको भजन में ही मिलेगा। इसीलिए सबके बीच रहते हुऐ तुम लोग भजन करो और कभी नागा न हो।





नैमिषारण्य में महामानव कुम्भ





उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 100 किलोमीटर पश्चिम की तरफ सीतापुर जिले में स्थित नैमिषारण्य जो अब नीमसार के नाम से जाना जाता है। प्रदेश की एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थली है। इसके आसपास के स्थलों से जुड़ा अनेक

एतिहासिक प्रसंग-88 हजार तपस्वियों की तपोभूमि नीमसार, वेदव्यास की निवासस्थली नीमसार। ऐसा कहा जाता है कि वेदव्यास जी ने वहीं से वेदों का प्रचार किया था। नीमसार से 10 किलोमीटर पर स्थित मिश्रिख जहां दधीचि मुनि की दान कथा इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में लिखी गई है। उन्होंने अपनी हड्डियों का दान किया था। वहीं पर नीमसार में स्थित है चक्रतीर्थ। किवदन्ती है कि ब्रह्मा ने एक मानस चक्र चलाया था जो जाकर उस स्थान पर

गिरा जिसे आज चक्रतीर्थ कहते हैं। ब्रह्मा का चक्र धरती को बेधकर पाताल चला गया। वहां से पानी का श्रोत फूटा और यह जन विश्वास है कि वह पानी का श्रोत आज भी उसी अनवरत गति से प्रवाहित हो रहा है। आज भी वहां पर गोलाकार कुण्ड बना दिया गया है जहां तीर्थयात्री आज भी स्नान करते हैं।

नामसार में ही प्रसिद्ध सन्यासी नारदानन्द जी का आश्रम है। बताते हैं कि इसी तीर्थस्थली पर ही 88 हजार तपस्वियों ने इस पर मंत्रणा की थी, विचार गोष्ठी किया था कि कलयुग में धर्म की रक्षा कैसे की जाएगी। ऐसा भी कहा जाता है कि वेद व्यास जी ने उसी स्थली पर कहा था कि ‘ऐ ब्राह्मणों! अहंकार मत करो। एक वक्त आएगा जब तुम्हें जमीन पर बैठना पड़ेगा और तुम उनकी हां हुजूरी करोगे जो अभी तुम्हारे सामने झुकते हैं। योगियों की वाणी झूठ नहीं होती। जो वे कह गए कभी न कभी सत्य सिद्ध होती ही है।



88 हजार ऋषियों ने जो धर्म को बचाने की मंत्रणा की थी वह भी बड़ी महत्वपूर्ण थी और ऐसा लगता है कि उनकी सारी मंत्रणायें विचार गोष्ठियां इस 60-65 वर्षीय लोकतंत्र के लिए ही थीं। क्योंकि जन्म लेने के साथ ही इस लोकतंत्र ने धर्म, कर्म, मान-मर्यादा, आदर-सम्मान, प्यार-मुहब्बत, सदाचार सबको पैर से मारना शुरू कर दिया जो आज अपनी चरम सीमा पर है। मन्दिर खतरे में पड़ गया, मस्जिद खतरे में पड़ गई, गुरूद्वारा खतरे में पड़ गया, जाति-बिरादरी खतरे में पड़ गई देवी-देवता और भगवान का तो अस्तित्व ही खत्म हो गया। और रहे संत-महात्मा, पीर-फकीर उन्हें तो लोकतंत्र ने गया-गुजरा बना दिया।

लेकिन ये भारतभूमि है धर्मभूमि है इसलिए यहां वो सबकुछ रहेगा, वो सनातन, पुरातन मान-मर्यादायें, आदर-सत्कार, साधू-संतों, पीरों-फकीरों की महत्ता रहेगी और देवी-देवता भगवान, खुदा ये किसी के नकारने से खत्म हो जाऐंगे ? हां ये बात अलग है कि इनकी शक्ति को नकारने वाले अपने ही अस्तित्व को नकार बैठें।

ऐसी पवित्र नैमिषारण्य की भूमि पर बाबा जयगुरूदेव जी महाराज ने गुरूपूर्णिमा का महान पर्व 10 दिनों 13 से 22 जुलाई तक वर्ष 1997 में आयोजित किया। साथ ही बाबा जी ने इसमें हर वर्ग का, हर जाति का, हर सम्प्रदाय का खुला आवाहन किया। यह समय कुछ विशेष महत्व का है, परिवर्तन के उभरते संकेतों का है, एक युग के आने और दूसरे युग के जाने का है। बाबा जी ने बहुत पहले ये आवाज उठाई थी कि ‘‘कलयुग में कलयुग जाऐगा-कलयुग में सतयुग आऐगा।’’ इस तपस्थली से कलयुग के जाने का भी संकेत मिलेगा और कलयुग में सतयुग के आने की भी आहट सुनाई देगी।

13 से 22 जुलाई 1997 तक नैमिषारण्य के कर्म प्रायश्चित अति महामानव कुम्भ में बाबा जयगुरूदेव जी महाराज ने कहा कि मालिक ने सुरतों (जीवात्माओं) के एक छोटे भण्डार को उतारा तो उसी के साथ संतबोध के साथ संतों को भी भेजा। जब से जीवात्मायें नीचे उतारी गईं तभी से संत बराबर यहां आते रहे और जब तक एक भी जीवात्मा यहां रह जाऐगी संत बराबर यहां रहेंगे।

पहले और युगों में संत चुपचाप गुप्त रहकर जीवों की देखरेख किया करते थे और यहां का सब हाल मालिक के दरबार में पेश करते थे। थोड़े दिन पहले मालिक की मौज हुई कि जीवात्माओं को वापस उनके देश में बुला लिया जाए, जब

उनकी मौज-मर्जी हुई जीवात्माओं को रास्ता बताओ, उनके कर्मों को माफ करो और साधन-भजन कराकर सुरतों को चढ़ाकर वापस ले आओ।

कबीर साहब पहले प्रगट संत हुऐ जिन्होंने जीवों का रास्ता खोला। यही कारण है कि पहले के शास्त्रों और पुराणों में संतों के रास्ते और साधन का कोई जिक्र नहीं मिलता। ये सुविधा कलयुग में जीवात्माओं को दी गई। उनसे कहा गया कि संतों-फकीरों के पास जाओ नाम भेद लेकर नाम और शब्द की कमाई करो और परमात्मा के पास अपने देश में पहुंच जाओ। ये भी बताया गया कि कलयुग में तुम्हारे मानसिक पाप क्षमा किए जाऐंगे जो और युगों में क्षमा नहीं किऐ जाते थे। यही एक अधिकार परमात्मा की प्राप्ति का सभी जीवों को चाहे स्त्री हो, पुरूष हो, बूढ़ा हो, जवान हो, बच्चा हो, किसी कौम का हो सबको मिला है। आप चाहो कि आपको दुनियां में समान अधिकार मिले तो ये नहीं हो सकता क्योंकि ‘‘कर्मप्रधान विश्व करि राखा।’’ जो जैसा करेगा उसे वैसा ही दुख-सुख, अमीरी, गरीबी भोगना पड़ेगा। कोई इससे बच नहीं सकता।

‘‘ब्रह्मा, विष्णु, महादेव इन तीनों के अपने-अपने काम हैं। पूजा शिव और विष्णु की होती है ब्रह्मा की नहीं। आपको तो मालूम नहीं कि एक झूठ बोलने पर ब्रह्मा की पूजा नहीं होती। आप कहते हो हम इनको मानते हैं। आपने इनका दीदार किया? आपने कभी किसी सिद्ध पुरूष से पूछा कि ये कैसे मिलते हैं ? आप तो कहीं गऐ ही नहीं, किसी से पूछा नहीं, कुछ जानते नहीं और बस बकते हैं कि हम उनको मानते हैं उनको मानते हैं।

इसीलिए सत्संग की महिमा है। सत्संग नाच-गाना, कहानी-किस्सा नहीं है। सत् और असत् का निरूपण होता है। ये है सत्संग इसी के लिए कहा हैः-

एक घड़ी आधी घड़ी

आधी में पुनि आध।।

तुलसी संगत साध की।

हरे कोटि अपराध।।

गोपनीय संत अभी भी हैं पर उनको हिदायत है कि वे कोई भी इशारा उधर का नहीं करेंगे। यह काम केवल प्रगट संतों का है। दुनियां की दौलत, सामान आप कितना सहेजकर, छिपाकर रखते हो और महात्मा की दी हुई अनमोल दौलत जिसके आगे क्या दुनियां स्वर्ग-बैकुण्ठ भी कुछ नहीं है वो सम्हालकर रखते हों

एक-एक दिन एक-एक वर्ष आप की आयु का खत्म होता जा रहा है। यह परदेश है। काल का देश है थोड़े दिन के लिए तुम्हें यह मनुष्य शरीर दिया है। तुम इस मकान में अपना काम कर लो, दुनियां को उतना ही रखो जितना जरूरी है और

अपनी जीवात्मा को जगाकर वापस लौट चलो। काल भगवान ने आपको मकान दिया और ये कह दिया कि कर्म का विधान बना दिया है तुम इस मकान को गन्दा मत करना, कूड़ा-कचरा मत भरना। वह किसी को छोड़ता नहीं है। आप उसकी व्यवस्था को मत बिगाड़ो।

हमने आपको नामदान दिया ताकि आप 24 घण्टे में से एक घण्टा समय निकालकर ध्यान-भजन करो। पर आपने कभी किया, कभी नहीं किया लेकिन जो समय आपका निकल गया वो खत्म हो गया। जब आपको नाम भेद मिल गया तो कम से कम एक घण्टा आपको भजन करना ही चाहिऐ।

महात्मा भी अपना हर काम तरीके से करते हैं। वह जब कहते हैं कि तुम भजन करो तो तुम्हें भजन करना चाहिऐ। भजन से कर्मों की सफाई करो लेकिन तुम बैठोगे ही नहीं तो सफाई कैसे करोगे ? और बैठे भी तो मन भागता रहा और आपको ये भ्रम हो गया कि हम भजन पर बैठे। भजन करने वाला भागता रहा तो भजन कहां हुआ ? थोड़ा मन को रोको ताकि ध्यान-भजन का फल मिले। बोझा लादने की जरूरत नहीं है। महात्मा कभी भजन नहीं छोड़ते हैं। वह भी तो आपका बोझा लादते हैं। भजन नहीं करेंगे तो उतारेंगे कैसे ? आपने समझ लिया कि टाट पहनने से सब कुछ हो गया ? लेकिन टाट पहना और टाट की मर्यादा नहीं रखी तो कुछ नहीं होने वाला। न भजन करोगे, न सुमिरन-ध्यान करोगे और आगे-आगे चले आओगे। समझते हो कि सब कुछ हो गया। वह मालिक सब कुछ देखता है। तुम चाहे आगे कूदो या पीछे रहो। आगे आने वालों के पीछे रहने वाले जो चुपचाप सेवा, ध्यान-भजन में लगे रहते हैं वो बहुत अच्छे होते हैं। वो दिखावे के लिए आगे नहीं भागते, वह सेवा, सेवा नहीं है जो दिखाया जाऐ और जिसका ढिंढोरा पीटा जाऐ। वह तो चालाकी और होशियारी है।

महात्माओं के यहां बड़े-बड़े लोग सेवा किया करते थे पर अपना परिचय नहीं देते थे, दिखावा नहीं करते थे। उन्हें क्या दिखाना ? वह तो सेवा-भजन करते थे। जो ढिंढोरा पीटते है कि मैंने पांच किलो दिया, मैंने ये दिया, मैंने वह किया। यह क्या कोई सेवा होती है ?

तुम एक बात का ध्यान रखो कि भण्डारे में कभी कोई कमी नहीं होती। तुम अपने मन को खराब मत करो। जो अपने मन को खराब करेगा वो खुद भोगेगा। तुम ऐसा क्यों सोचते हो कि तुम जो दोगे वह कोई ले लेगा। ऐसा मत सोचो। ये सत्संगी के लक्षण नहीं हैं। ये निम्न विचार हैं। तुम अपने भाव में सेवा करो।

मैं यहां आया तो लोगों ने सोचा कि कहीं बाबा जी इस जमीन पर कब्जा न कर लें। अरे! तुम्हें इतना भी ज्ञान नहीं है कि ऋषि, मुनि, महात्मा, संत-फकीर यहां अपना कुछ भी नहीं समझते। वह तो आऐंगे फिर ऐसे चले जाऐंगे जैसे चिड़ियां उड़ गई फुर्र। तुम देखते रह जाओगे।

सही और सच्ची बात तो यह है कि तुम लोग एक भी आदमी छूने लायक नहीं हो, ऐसी गन्दगी लादी है। पर यह है कि वह महापुरूष तुमसे घृणा नहीं करते। तुमने जो लाद लिया है उसे हल्का करना है। कर्म प्रायश्चित की एक तपस्या

होती है। तपस्या करोगे तो सुनवाई होगी, नहीं करोगे तो तुम्हारी कोई नहीं सुनेगा। आपको देखने को मिलेगा कि एक आदमी कितना आदमी लाया है। आप कहोगे कि द्वापर से अब तक ऐसा कार्यक्रम नहीं हुआ। यह आत्म कल्याण का अच्छा योग है। ये तुम्हारे पत्रा का योग नहीं है, ईश्वरीय योग है। प्रयागराज में जमीन तैयार हुई थी, नैमिषारण्य से चिंगारी फूटेगी तो पूरे देश में फैल जाऐगी। ऐसे चार कार्यक्रम हो जाऐंगे तो देश जाग जाऐगा।

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